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वंशवाद — बहन हरिद्वार से और भाई खटीमा से लड़ेगा चुनाव

ब्यूरो। सीएम हरीश रावत के कुनबे के दो अहम सदस्य​ विधानसभा चुनावों में अपनी दावेदारी पेश करने जा रहे हैं। सीएम की बेटी अनुपमा रावत जहां हरिद्वार जनपद की हरिद्वार देहात सीट से चुनाव लड़ने की तैयारियों में जुटी हैं, वहीं उनके बड़े भाई विरेंद्र रावत कुमाउं मंडल की खटीमा सीट से दावेदारी पेश करने जा रहे हैं। हालांकि, चुनाव की तैयारी सीएम रावत के तीसरे बेटे आनंद रावत भी चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। लेकिन, चुनाव कहां से लड़ना है, इसको लेकर आनंद अभी पसोपेश में हैं।
हालांकि सीएम हरीश रावत को सीएम का ताज पहनने के लिए चालीस सालों से अधिक तपस्या करनी पड़ी। लेकिन, उनकी इस तपस्या का लाभ उनसे ज्यादा उनके परिवार के सदस्य उठाना चाहते हैं। सीएम हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत इन दिनों हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा सीट पर काफी सक्रिय हैं। यहां हरीश रावत के पुराने वफादार अनुपमा के लिए माहौल बनाने में लगे हुए हैं। खुद हरीश रावत भी इस विधानसभा क्षेत्र में पिछले कुछ समय से कई दौरे कर चुके हैं। चुनाव लड़ने के ख्वाब संजोए बैठे दूसरे कांग्रेसी भी इस सीट पर ज्यादा सक्रिय नहीं दिखाई दे रहे हैं। जो कोशिशों में लगे हैं वो भी सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। हालांकि, अभी तक सीएम की बेटी के तौर पर स्थानीय लोगों में अनुपमा को लेकर इतना उत्साह दिखाई नहीं देता है। स्थानीय निवासी आलम ने बताया कि सीएम साहब का राजनीतिक स्टाइल लोगों को ज्यादा पंसद आता है। अनुपमा को लेकर लोगों में अभी भी हिचक बनी हुई है। इसी तरह खटीमा विधानसभा क्षेत्र से बड़े भाई विरेंद्र रावत तैयारियों में जुटे हुए हैं। विरेंद्र यहां लंबे समय से सक्रिय हैं। गढ़वाल के मुकाबले विरेंद्र रावत की सक्रियता कुमाउं में ज्यादा है। खुद विरेंद्र रावत ने बताया कि वो खटीमा से तैयारियों में जुटे हैं। साफ है कि रावत परिवार के ये दोनों चेहरे विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी पेश करने जा रहे हैं।

पार्टी के लिए नहीं होगा आसान
सीएम हरीश रावत के परिवार के लोगों को टिकट​ मिलना इतना भी आसान नहीं है। कांग्रेस सत्ता में वापसी चाहती है तो टिकट बंटवारे में सभी तरह के गणित को ध्यान में रखना होगा। सीएम के परिवार से दो—दो लोगों का चुनाव लड़ना पार्टी में विरोध का बिगुल भी बजा सकता हैं। हालांकि, हरीश रावत के लिए भी आलाकमान को इस बात के लिए राजी करना आसान नहीं होगा। फिर भी अपने परिवार के लिए कौन नेता नहीं सोच रहा है। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक सभी परिवारवाद को बढावा दे रहे हैं।

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