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‘क्षेत्रीय दल ही रोक सकते थे जल, जंगल और जमीन की लूट’

जानेमाने पत्रकार और पर्यावरणविद् त्रिलोक चंद भट्ट उत्तराखण्ड के विभिन्न इलाकों में लगातार भ्रमण करते हैं। राज्य आंदोलनकारी के रूप में वो प्रदेश के मिजाज को भी जानते हैं। ट्रेकिंग करने के लंबे अनुभव ने उन्हें प्रदेश के दूरस्थ इलाकों का दौरा करने का मौका दिया। उतराखण्ड राज्य आंदोलन के इतिहास से लेकर हिंदी भाषा का विकास पर पुस्तकें लिख चुके हैं। उत्तराखण्ड के मौजूूदा हालातों पर उन्होंने बेबाकी से अपनी राय रखी है।

सवाल—सवाल— अलग राज्य बनने के बाद आपकी नजर में क्या—क्या बदलाव उत्तराखण्ड में हुए हैं।

जवाब — अलग राज्‍य बनने के बाद राज्‍य में उत्‍तराखण्‍ड शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, चिकिंंत्‍सा सुविधाओं बढ़ोतरी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों को संपर्क मार्गों का विद्युतिकरण तथा संचार सुविधाओं का भी काफी विकास हुआ है। रोजगार के अवसर और लोगों का आर्थिक स्‍तर उँचा उठा है।

सवाल— उत्तराखण्ड की सबसे बडी चुनौती क्या है।
जवाब— उत्‍तराखण्‍ड में राजनैतिक भ्रष्‍टाचार रोकना सबसे बड़ी़ चुनौती है।

सवाल— पलायन और बेरोजगारी के अलावा पानी की किल्लत की समस्या का हल कैसे हो सकता है।
जवाब— जल संवर्धन के लिये लोगों को जल संचय करने के लाभ बताने के साथ-साथ चाल-खाल योजना के माध्यम से जल संरक्षण करने वालो को प्रोत्साहित किया जाय। चौड़ी पत्‍ती वाले वृक्ष पौधेे रोप कर सघन वृक्षारोपण के साथ-साथ वृक्षों की बड़े होने तक उनकी सुरक्षा के इंतजाम किये जायें। चीड् की पत्तियों का उपयोग चेकडॉम बना कर पानी रोकने में किया जाये। आबादी के आस-पास पहाड़ी ढालों पर क्रमबद्ध गड्ढे बनाकर वर्षाजल संचय और चौड़ी पत्‍ती के पौधे लगाने से पानी के सूखते स्रोतों में पानी की उपलब्‍धता कायम रहती है। प्राकृतिक जलस्रोतों, धारे, नौलों के साथ छेड़छाड् न की जाये। बांध, सड़क और बड़े निर्माण कार्यों में विष्‍फोटकों का प्रयोग न किया जाया। विस्‍फोटो के कंपन से प्राकृतिक जनस्रोतों की भूगर्भीय जल धाराएं लुप्‍त हो रही हैं।

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सवाल— प्राकृतिक आपदाओं को लेकर क्या सरकार के प्रयासों से आप संतुष्ट हैं।
जवाब—प्राकृतिक आपदाओं को लेकर सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। सरकार ने केदारनाथ आपदा से सबक नहीं लिया। खतरे की जद में आने वाले गा्ंवों का विस्‍थापन नहीं किया गया। भारी वर्षा की चेतावनी मौसम विभाग जारी करता है लेकिन भूस्‍खलन और पहाडि़यों के दरकने का कोई चेतावनी सिस्‍टम नहीं है, राज्‍य में पहाड़ो़ंं की तलहटी और नदियों के किनारे हजारों गांव ओर मानव बस्तियां हैं। खतरे की जद में होने के बावजूद के अपनी आवश्‍यकता के लिये निर्माण कर रहे हैं। उन्‍हें रोकने वाला कोई सिस्‍टम नहीं है। आपदा के समय कोई त्‍वरित कार्यवाही बल भी नहीं पहुंच रहा है। आपदा के बाद स्‍थानीय निवासी स्‍वयं एक-दूसरे की मदद में जुटते हैं। उन्‍हें मदद कई घंटों या दिनों बाद मिलती है।
पिथौरागढ़ का बस्‍तड़ी ऐसा उदाहरण है जहां आपदा में मारे गये लोगों के दाह संस्‍कार के लिये वन विभाग ने डीएम के निर्देश पर तब लकड़ी उपलब्‍ध कराई जब लोगों को शवों को सड़क पर रख दिया। यह सब सिस्‍टम का फेलियर है।

सवाल— बतौर उत्तराखण्ड आंदोलनकारी आप अब तक की सरकारों के कार्यों से संतुष्ट हैं।
जवाब—उत्‍तराखण्‍ड राज्‍य की परिकल्‍पना एक आदर्श राज्‍य के रूप में की गई थी। लेकिन यह हमारा दुर्भाग्‍य रहा है कि जिन पार्टियों से राज्‍य में राजनैतिक स्थिरता, और भ्रष्‍टाचारमुक्‍त सरकार देने की उम्‍मीदें थी उस पर कोई भी सरकार सफल नहीं हुई है। नेता और नौकरशाहों की नजर सिर्फ संसाधनों की लूट और सत्‍ता तथा शासन की शीर्ष पर पहुुंचने की रही है।

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सवाल — कौन से सीएम आंदोलनकारियों के सपनों के ज्यादा नजदीक दिखाई देते हैं।

जवाब—वर्तमान मुख्‍यमंत्री हरीश रावत राज्‍य आन्‍दोलनकारियों के अधिक नजदीक हैं। उन्‍होंने आन्‍दोलनकारियों के लिये कई घोषणायें भी की हैं। लेकिन यह घोषणायें भी भविष्‍य के राजनैतिक लाभ के लिये अधिक हैं।

सवाल— आप लगातार प्रदेश में लोगों से रूबरू होते हैं, जनता का मिजाज सरकारों के प्रति कैसा है।
जवाब— जनता की कसौटी पर कोई भी सरकार सफल नहीं हुई है। जनता ने किसी समय क्षेत्रीय ताकत के रूप में उक्रांद जैसे दल में राज्‍य का भविष्‍य देखा था, लेकिन आपसी कलह से यह दल कई टुकड़ो में विभाजित हो गया। जनता के सामने कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्‍ट्रीय पार्टियां ही विकल्‍प थी लेकिन यह पार्टियां भी जन अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी जिस कारण जिस कारण सत्‍ताधारी पार्टियों को दूसरों की बैसाखी की जरूरत पड़ती रही। जनता अब भी पूर्णत: बहुमत के साथ एक दल केे प्रति निष्‍ठावान प्रतीत नहीं होती।

सवाल — क्या तीसरा विकल्प ना होना प्रदेश के लिए ज्यादा हानिकारक साबित हुआ है।
जवाब— राज्‍य में क्षेत्रीय ताकतों का तीसरा विकल्‍प बनता तो निश्चित रूप से बड़ा परिवर्तन राज्‍य की व्‍यवस्‍थाओं, नीतियों, योजनाओं में देखने को मिलता। यहां के जल, जमीन और जंगलों की लूट पर कुछ हद तक विराम लगता। क्‍योंकि राष्‍ट्रीय राजनीतिक पार्टियों की सोच दिल्‍ली से आरंभ होती है और पूरे देश के प्रदेशों की राजनीति केे परिपे्क्ष्‍य में देखी जाती है। जबकि क्षेत्रीय दलों या ताकतों के मजबूत होने से सिर्फ उत्‍तराखण्‍ड के क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता मिलती और निश्‍चित रूप से राज्‍य के लिये लाभ का कारण भी बनती।

सवाल— आप लगातार पत्रकारों की आवाज बुलंद करते रहे हैं। झूठी प्रसार संख्या दिखाकर सरकारों से विज्ञापन लेने की बडी धांधली को कैसे रोका जा सकता है।

जवाब— प्रिंटिंग प्रेस में अखबार की खपत, प्रेस के बिजली का बिल, अखबार के सर्कुलेशन के हिसाब से नियुक्‍त स्‍टाफ, स्‍टाफ के ईएसआई, पीएफ आदि की कटौती की है या नहीं है, इन सूचनाओं /साक्ष्‍यों के आधार पर झूठा सर्कुलेशन पकड़ में आ सकता है। खास तौर पर फाइल में छपने वाले दैनिक अखबारों के पास दूसरे शहर में 24 घंटे में अखबार पहुंचाने के साधन नहीं हैं। उसके बाद भी जिला सूचना कार्यालयों में अखबार पूरे चढते हैं जबकि कई लोग एक-एक हफते के दैनिक अखबार एक साथ जमा कराते हैं। यह सब भ्रष्‍टाचार की पराकाष्‍ठा है। समय-समय पर औचक निरीक्षण हों तो अखबार अनियमित हो जायेगा और विज्ञापन स्‍वत: बंद हो जायेंगे।

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