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तीन माह की बच्ची के पेट से निकाला कान का झुमका, बडे भाई ने रखा था मुंह में

चंद्रशेखर जोशी।
तीन माह की बच्ची ने गलती से कान का झुमका निगल लिया। इसके बाद उसकी हालत खराब होने लगी। गंभीर अवस्था में उसे हायर सेंटर एम्स ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने बिना आॅपरेशन के ही उसके पेट से कान का झुमका निकाला। बच्ची की तबीयत अब खतरे से बाहर बताई जा रही है।
एम्स ऋषिकेश अस्पताल के मुताबिक रायपुर, देहरादून की एक महिला राजेश्वरी देवी अपने 3 माह की नन्ही बच्ची अंशिका को लेकर बदहवाश हालत में एम्स ऋषिकेश पहुंची। महिला ने बताया कि उसके ढाई वर्षीय बेटे अंश ने खेल-खेल में अपनी 3 माह की नन्ही बहिन के मुंह में कान का झुमका डाल दिया। जो बच्ची के पेट में जा पंहुचा। जिस समय बच्ची को एम्स में लाया गया, उस समय उसकी हालत अत्यन्त नाजुक हो गयी थी। एक्सरे से पता चला कि वो रिंग बच्ची के पाॅयलोरस आंत में फंस गयी है।

अत्यन्त गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल ही एम्स के शिशु रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅक्टर नवनीत कुमार भट्ट ने हाई रिस्क लेते हुए बेहद जटिल प्रक्रिया अपनाकर बच्ची को बचाने का निर्णय लिया। डाॅक्टर भट ने बताया कि पेट के पाॅयलोरस में फंसी यह रिंग लगभग 3.5 सेमी लम्बी और 2.5 सेमी चैड़ी थी। जिसमें डेढ़ सेमी लम्बा एक स्क्रू भी लगा था। बताया कि बच्ची को बचाना आवश्यक था, लेकिन मात्र 3 महीने की उम्र होने के कारण उसके पेट की सर्जरी नहीं की जा सकती थी। ऐसे में बच्ची को बेहोश कर आधुनिक उच्चस्तरीय मेडिकल तकनीक अपनाने का ही एकमात्र विकल्प बचा था। निर्णय लिया गया कि बच्ची को बेहोश कर दूरबीन एण्डोस्काॅपी विधि से रिंग को बाहर निकाला जाए। डाॅक्टर भट्ट ने बताया कि बच्ची की उम्र इतनी कम होने के कारण इस विधि का इस्तेमाल करना भी अत्यन्त खतरनाक होता है।
उन्होंने बताया कि फिर बेहद हाईरिस्क स्थिति में बच्ची के पेट की पाॅयलोरस में फंसी रिंग को बड़ी ही गहनता और सूझबूझ से निकालने का काम शुरू किया गया। प्रक्रिया के बाद टीम बच्ची को बचाने में सफल रही। अब बच्ची पूर्ण तौर से स्वस्थ है। 2 दिन तक ऐम्स में रखने के बाद उसकी हालत सामान्य देखते हुए उसे अस्पताल छुट्टी दे दी गई । बच्ची की जान बच जाने पर उसकी मां राजेश्वरी देवी और पिता महेन्द्र असवाल ने छलकती आंखों से एम्स चिकित्सकों का आभार जताया। उल्लेखनीय है कि यह पहला मौका है, जब उत्तराखण्ड के किसी अस्पताल में इतनी कम उम्र की बच्ची पर दूरबीन एण्डोस्काॅपी विधि का उपयोग कर जान बचायी गयी हो। इस नई सफलता पर एम्स निदेषक प्रोफेसर रविकान्त ने चिकित्सीय टीम की पीठ थपथपायी और इसे ऐम्स के इतिहास में एक नई उपलब्धि बताया।

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हरिद्वार के डेढ साल के बच्चे ने भी निगली थी बैटरी

ऋषिकेश। एम्स के शिशु रोग विभाग के डाॅक्टर नवनीत कुमार भट ने इसी माह 3 दिसम्बर को भी सुभाषनगर हरिद्वार के डेढ़ साल के एक बच्चे की जान भी इसी दूरबीन एण्डोस्काॅपी विधि से किए गए उपचार से बचायी थी। उस केस में बच्चे ने खेल-खेल में ढाई सेमी साईज की एक बटन बैट्री निगल ली थी, जो बच्चे की खाने की नली एस्कोफागस में 2 दिनों से फंसी पड़ी थी। बैट्री में नौसादर और एसिड होने की वजह से भोजन नली में गहरे घाव बन चुके थे और बच्चे के मुंह से लगातार लार टपकने लगी थी। डाॅक्टर भट ने बताया कि उपचार के बाद वह बच्चा भी अब पूर्ण तौर से सुरक्षित है। जिसे अस्पताल से छुट्टी देने के बाद घर भेजा जा चुका है।

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