daughter struggle to save the life of her covid infected father

बेटी पिता को हौंसला देती रही लेकिन अस्पताल स्टॉफ ने ऐसा किया कि पिता की हिम्मत टूट गई

हरीश कुमार।
हरिद्वार के ज्वालापुर निवासी 59 वर्षीय भेलकर्मी कोरोना संक्रमित हुए तो उनकी बेटी का एक ही मकसद था कि अपने पिता को सही सलामत घर वापस लाना। खुद मेडिकल क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाली गरिमा को लगता था कि उनकी लडाई कोरोना से हैं लेकिन सरकारी और निजी अस्पतालों की व्यवस्था से गरिमा दो चार हुई तो उन्हें महसूस हुआ कि कोरोना से ज्यादा उन्हें इसे लूटतंत्र से निपटना है और अगर सिस्टम से हारी तो पिता का हौंसला टूट जाएगा। पिता का आक्सीजन लेवल पचास से नीचे जा पहुंचा लेकिन बेटी पिता को हौंसला देती रही पर अस्पताल स्टाफ की एक गलती ने उन्हें झकझोर दिया और पिता की हिम्मत टूट गई और वो बस रोने लगे। ये कहानी सिर्फ गरिमा की नहीं है बल्कि उन अनगिनत लोगों की है जिन्होंने कोरोना की दूसरी लहर में सिस्टम की बदहाली देखी है। ग​रिमा ने हमसे आपबीती साझा कि आप भी पढिए….

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ओजस अस्पताल में 15000 रुपए बेड चार्ज, दवाईयां अलग, 150 रुपए प्रति घंटा आक्सीजन
गरिमा बताती है कि उनके पिता को 21 अप्रैल को सिरदर्द और तेज बुखार हुआ, वो तुरंत आइसोलेट हो गए अगले दिन ज्वालापुर सीएचसी में एंटीजन टेस्ट निगेटिव आया लेकिन अस्पताल ने लक्षण के बावजूद आरटीपीसीआर जांच नहीं की। मैंने आक्सीमीटर खरीदा तो आक्सीजन लेवल 93 था, अगले दिन बीएचईएल अस्पताल पहुंचे जहां एंटीजन टेस्ट पॉजिटिव आया। साथ ही आक्सीजन लेवल 90 था। लेकिन भर्ती करने के बावजूद डाक्टरों ने दस दिन की दवा लिखकर घर भेज दिया।

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सिलेंडर मिला लेकिन किसी काम का नहीं था
वहीं पिता की हालत को देखते हुए मैंने आक्सीजन सिलेंडर का प्रबंध किया। चार घंटे बाद किसी तरह आक्सीजन सिलेंडर मिला लेकिन पूरे हरिद्वार में कहीं भी ह्यमिडिफायर नहीं मिल पाया। किसी तरह रात गुजारी। अब पिता की दिक्कत बढ रही थी लेकिन अस्पतालों के बैड फुल थे। ​किसी तरह ओजस अस्पताल में एक बैड मिला। आक्सीजन लेवल 86 रह गई। बैड चार्ज 15000 रुपए था और 150 रुपए प्रति घंटा की दर से आक्सीजन दे रहे थे। इसमें भी जांच और दवाईयां का खर्चा अलग था। गरिमा को लगा कि शायद अब सब कुछ सही हो जाएगा। लेकिन आधी रात में अस्पताल प्रबंधन ने बुलाया और कहा कि आपके मरीज को वेंटिलेटर की आवश्यकता है इन्हें ले जाइये। गरिमा ने हाथ जोडे और किसी तरह रात रुकने की अनुमति मिल गई। अगली सुबह ​ग​रिमा पिता को लेकर मेला अस्पताल जा चुकी थी जो उनके लिए बुरा सपना साबित हुआ।

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मेला अस्पताल में नहीं हुई देखरेख
मेला अस्पताल में सोचा था कि वहां ईलाज मिल जाएगा लेकिन वो मेरे जीवन की बहुत बडी गलती साबित हुई। दोपहर 12 बजे का लंच पिता को तीन बजे तक नहीं दिया गया था। दवाईयां देने का भी कोई समय नहीं था। बल्कि वहां तो पानी तक पूछने वाला कोई नहीं था। पिता के पास फोन था तो उन्होंने वहां से ले जाने के लिए कहा। मैं लामा ऐच्छिक डिस्चार्ज कराकर पिता को कहीं ओर ले जाना चाहती थी। लेकिन देहरादून से लेकर हरिद्वार तक कहीं बेड नहीं थे। फिर कनखल के राम किशन​ मिशन यानी बंगाली अस्पताल ले गई। इसके लिए मैंने सरकारी एंबुलेंस मंगवाई। पिता का एसपीओटू 60 था और मेला अस्पताल स्टॉफ उन्हें पहली मंजिल से पैदल लेकर नीचे आया। यही नहीं उनका सामान भी उनके हाथ में ही था। वो बहुत कमजोर लग रहे थे, जबकि स्टाफ ने पीपीईकिट पहनी थी लेकिन उन्होंने सामान पिता को ही पकडाए रखा। सरकारी एंबुलेंस चालक ने इतना बुरा व्यवहार किया। चालक ने ग्लव्स जमीन पर डाल दिए और पिता को कहा कि नीचे से उठाकर पहन लो। मेरा सब्र जवाब दे रहा था लेकिन मैं सब अपमान सहती गई।

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बंगाली अस्पताल में टूटा हौंसला
बंगाली अस्पताल में एचडीयू में भर्ती किया। यहां लगा कि अब पापा की तबीयत ठीक हो रही है। लेकिन 25 अप्रैल की रात 12 बजे अस्पताल स्टाफ ने मुझे बुलाया और हंसते हुए बोला कि हमने जितना करना था कर लिया अब आप अपने पिता को यहां से ले जा सकते हैं। मैंने हर जगह पता किया लेकिन कहीं भी वेंटिलेटर बैड नहीं था। मैंने खुद का परिचय और अन्य कुछ लोगों से फोन कराए तो मुझे रात का समय मिल गया।

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डीएम से मांगी मदद लेकिन सब बेकार था
गरिमा बताती हैं उन्होंने वेंटिलेटर बैड के लिए डीएम सी रविशंकर को मैसेज किया, ट्वीट भी किया। लेकिन वहां से भी कोई मदद नहीं मिली। यहां गौरतलब है कि जिला प्रशासन जब अपने सरकारी अस्पतालों के वेंटिलेटर ही नहीं चला पाया तो निजी अस्पतालों में कैसे बैड उपलब्ध कराने की मदद कर सकता था।

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पिता को हौंसला देती लेकिन स्टाफ ने तोड दिया
वहीं गरिमा बताती है कि बंगाली अस्पताल के हर स्टाफ को वो पैसा दे रही थी ताकि वो उनके पिता को मोटिवेट करते रहे। रोजाना स्वीपर को 600 रुपए का गलव्स का डिब्बा चाहिए था। एक दिन डॉक्टर से वीडियो चैट हुई तो उन्हें साफ कह दिया कि पिता का इलाज यही होगा। लेकिन पांच मिनट बाद ही उन्हें फिर अपने पिता को ले जाने के लिए बोल दिया। पिता का आक्सीजन लेवल गिर रहा था। वहीं असपताल में मौतें हो रही थी और बिना परदा लगाए स्वस्थ मरीजों के सामने ही मरने वालों का पैक किया जा रहा था, जो मरीजों के मानसिक हालात पर बुरा असरल डाल रहा था। मैंने पिता को हौंसला दिया। लेकिन स्टॉफ ने पिता को बता दिया कि आपको वेंटिलेटर की जरुरत है और हमारे पास नहीं है। पिता ने मुझे बुलाया और रोते हुए बोले कि मुझे यहां से ले चलो। मैंने उन्हें कहा कि मैं ले चलती हूं। लेकिन अस्पतालों का हाल मुझे पता था। खैर दोस्तों की मदद और मेरे खुद के हौंसले से ​पिता की हालत में सुधार आता गया और 16 दिन बाद पिता सही हो गए।

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डिस्चार्ज के दिन पूरे स्टाफ ने पैसे लिए
वहीं जब पिता डिस्चार्ज हुए तो स्टाफ पैसे लेने आ गया। मैंने उस दिन ऐसे ऐसे कर्मचारी देखें जो पहले कभी नहीं देखें गए। गरिमा कहती है कि अस्पताल में हर चीज के रेट तय होने चाहिए। स्टाफ को पर्याप्त सैलरी मिलनी चाहिए ताकि वो मरीज के तीमारदारों से पैसे ना लें। उन्होंने बताया कि कोरोना में खुद का और मरीज का हौंसला बनाए रखना बहुत जरुरी है क्योंकि एक बार खुद हारे तो कोरोना रिकवर होने का चांस नहीं देता है। लेकिन ये भी सच है कि बदहाल सिस्टम हौंसला तोड देता है। मेंरे तीन से चार लाख रुपए खर्च हुए लेकिन पिता की जान बच गई। मैं जागरूक थी और पैसा भी था लेकिन बहुत से ऐसे हैं जिनके पास कुछ नहीं था और उनका दुख देखा नहीं जा रहा था।

वहीं राम किशन मिशन अस्पताल प्रबंधन की ओर से गरिमा के आरोपों का खंडन किया गया है। अस्पताल प्रबंधन की ओर से कहा ​गया कि ​गरिमा के पिता का बेहतर ईलाज किया गया और उन्हें इलाज के बिल में भी छूट प्रदान की गई। जहां तक स्टाफ के पैसे लेने का सवाल हैं उन्हें हमें शिकायत करनी चाहिए थी। हमें यहां सभी की शिकायतें सुन रहे हैं।

आपके साथ भी सरकारी या निजी अस्पतालों में हुआ है शोषण, तो हमें मैसेज करें : 8267937117

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