अतीक साबरी:-
नैनीताल। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली और नए कानून के लागू होने के बाद भी पुराने सदस्यों के बने रहने पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकलपीठ ने हल्द्वानी निवासी नसीम अहमद वारसी द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह याचिका प्रदेश के प्रशासनिक और धार्मिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए ‘संशोधित वक्फ अधिनियम 2025’ के प्रभावी होते ही वक्फ बोर्ड के पुराने मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल और उनकी वैधानिकता स्वतः समाप्त हो चुकी है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि नए प्रावधानों के तहत बोर्ड के सभी पांच नामित सदस्यों की सदस्यता खत्म हो गई है, इसके बावजूद वे न केवल अपने पदों पर बने हुए हैं, बल्कि बोर्ड की महत्वपूर्ण बैठकों में हिस्सा लेकर नीतिगत निर्णय भी ले रहे हैं। कोर्ट में दलील दी गई है कि जब तक सरकार नए कानून के मानदंडों के अनुसार नए सदस्यों का मनोनयन नहीं करती, तब तक वर्तमान बोर्ड द्वारा लिया गया कोई भी फैसला कानूनी रूप से शून्य और अवैध माना जाना चाहिए।
इस विवाद के केंद्र में बोर्ड के अध्यक्ष समेत पांच प्रमुख सदस्य हैं, जिनमें डॉ. हसन नूरी, अनीस अहमद, मोहम्मद इकबाल और जिया बानो शामिल हैं। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि नए कानून की मंशा बोर्ड की पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना है, लेकिन पुराने सदस्यों का हस्तक्षेप इस प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर रहा है।
अब सबकी नजरें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं, क्योंकि कोर्ट का अगला रुख यह तय करेगा कि क्या बोर्ड के पिछले कुछ महीनों के निर्णयों को रद्द किया जाएगा या सरकार को तत्काल नए बोर्ड का गठन करना होगा। इस नोटिस के बाद वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और प्रशासनिक निर्णयों पर भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं।

