मुगल बादशाह के दरबारी शायर से जलते थे गालिब

ब्यूरो। अजीम शायर गालिब अपने दौर में जितने पसंद किए जाते थे, उतने ही आज भी शायरी के चाहने वाले गालिब के अंदाज—ए—बयां को पसंद करते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि ये महान शायर अपने दौर के एक बडे शायर और मुगल बादशाह के दरबारी शायर से जलते थे। जी हां, ये शायर और काई नहीं बल्कि दिल्ली के एक गरीब सिपाही के बेटे थे, जिनकी परवरिश बेहद ​गरीबी में हुई। ये थे मलिकुश्शोअ़रा ख़ाक़ानी-ए-हिन्द शैख़ इब्राहीम जिन्हें शायरी की दुनिया में ‘ज़ौक़’ के नाम से जाना जाता है। गरीबी के हाल ये थे कि ‘ज़ौक़’ अपनी पढाई भी पूरी नहीं कर पाए। बहरहार अपनी शायरी के दम पर ‘ज़ौक़’ आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के दरबारी शायर बन गए। एक बार गालिब के घर के आगे से ‘ज़ौक़’ और उनके शार्गिद गुजर रहे थे। मिर्जा गालिब बाहर बैठे थे और उन्होंने इस तरह तंज किया ‘हुआ है शाह का मुसाहिब[18], फिरे है इतराता’। ये बात ‘ज़ौक़’ ने सुन ली और बादशाह जफर को बताई। बादशाह जफर ने गालिब को किले में तलब कर लिया और इसकी वजह पूछी। गालिब ने ये तो कबूल किया कि उन्होंने ऐसा कहा है लेकिन हाजिर जवाब गालिब तुरंत ही अगली लाइन सुनाकर इसे अपने उपर ले गए और ये शेर पढा।

हुआ है शह का मुसाहिब[18], फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में “ग़ालिब” की आबरू[19] क्या है

‘ज़ौक़’ गालिब की चालाकी भांप गए और बादशाह से अर्ज किया कि गालिब से इसकी पूरी गजल सुनी जाए। बादशाह ने हुक्म दिया तो गालिब ने मौके पर एक ऐसी गजल तैयार कर दी जो उनकी सबसे ज्यादा पढी जाने वाली गजलों में शुमार हो गए। बाद में ‘ज़ौक़’ ने भी गालिब की गजल की तारीफ की। ये गजल ​थी जो गालिब ने पढी थी…

हर एक बात पे कहते हो तुम कि ‘तू क्या है’
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू[1] क्या है

न शो’ले[2] में ये करिश्मा न बर्क़[3] में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंद-ख़ू[4] क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न[5] तुमसे
वर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़िए-अ़दू[6] क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन[7]
हमारी जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू[8] क्या है

जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू[9] क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं क़ायल[10]
जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त[11] अज़ीज़[12]
सिवाए वादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू[13] क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम[14] भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू[15] क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार[16] और अगर हो भी
तो किस उमीद[17] पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शह का मुसाहिब[18], फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में “ग़ालिब” की आबरू[19] क्या है
1— बातचीत का तरीका
2 — ज्वाला
3 — बिज़ली
4 — शरारती-अकड़ वाला
5 — अकसर बातें करना
6 — दुश्मन के सिखाने-पढ़ाने का डर
7 — चोला
8 — रफ़ू करने की जरूरत
9 — तलाश
10 — प्रभावित होना
11 —↑ स्वर्ग
12 — प्रिय
13 — गुलाबी कस्तूरी-सुगंधित शराब
14 — शराब के ढ़ोल
15 — बोतल, प्याला, मधु-पात्र और मधु-कलश
16 — बोलने की ताकत
17 — उम्मीद
18 — ऱाजा का दरबारी
19 —प्रतिष्ठा

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