Sheila Irene Pant
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अल्मोड़ा में जन्मी शीला पंत ने पाकिस्तान में महिलाओं को दिलाई आजादी, जानिये कौन है

ब्यूरो। कुमाउं के अल्मोड़ा जिले के कुमाउंनी ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली शीला इरेन पंत (Sheila Irene Pant) को पाकिस्तान में मादर—ए—वतन यानी वतन की मां का दर्जा हासिल है। शीला पंत ने पाकिस्तान की महिलाओं को पुरातन ख्यालात से आजादी दिलाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आर्मी और नेवी में महिलाओं की भर्ती के लिए रास्ते खोले। इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान वूमेन नेशनल गार्ड और आॅल पाकिस्तान वूमेन एसोसिएशन भी बनाई। जिसके जरिए उन्होंने महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया।

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Sheila Irene Pant

कौन थी शीला इरेन पंत
शीला इरेन पंत का जन्म अल्मोड़ा में 1905 में हुआ था। उनके पिता मेजर हेक्टर पंत ब्रिटिश इण्डियन आर्मी में मेजर जनरल के पद पर तैनात थे। उनके पूर्वजों कुमाउंनी ब्राह्मण थे जिन्होंने 1887 में ईसाई धर्म अपना लिया था। शीला की पढ़ाई लखनउ यूनिवर्सिटी से हुई। उन्होंने बतौर अध्यापक गोखले मेमोरियल स्कूल में पढाया और मा​स्टर डिग्री करने के बाद शीला दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में इकोनोमिक्स के प्रोफेसर के तौर पर कार्य करने लगी।

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Begum Liaquat Ali Khan

शीला पंत से कैसे बनी राणा लियाकत अली खान
दिल्ली के कॉलेज में 1931 में उनकी मुलाकात एडवोकेट लियाकत अली खान से हुई जो उस समय लेक्चर देने आए थे। इसके बाद 1932 में दोनों ने शादी कर ली। लियाकत अली खान ​ब्रिटिश सरकार में मंत्री भी रहे थे। लेकिन, पाकिस्तान की डिमांड में वो मौहम्मद अली जिन्ना के साथ हो गए। पाकिस्तान बनने के बाद लियाकत अली खान पाकिस्तान के पहले वजीर—ए—आजम बने और शील पंत, राणा लियाकत अली खान के तौर पर पाकिस्तान की प्रथम लेडी बन गई।

Sheila Irene Pant
Sheila Irene Pant

महिला उत्थान के लिए किया काम
पाकिस्तान बनने के बाद महिलाओं की स्थिति बेहद खराब थी। पाकिस्तान में नर्स बहुत कम थी। उन्होंने आर्मी से महिलाओं को ट्रेनिंग देने के लिए कहा। इसके बाद काफी संख्या में महिलाएं नर्स के तौर पर सेना में भी भर्ती हुई। इतना ही नहीं उन्होंने महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए कई अभियान चलाए। लियाकत अली खान की हत्या के बाद वो नीदरलेंड में दो दशक तक स्टेटवूमेन के तौर पर रही। इसके बाद उन्होंने ​जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार बनाने में भी मदद की और उनकी सरकार में वो मंत्री भी बनी। इसके अलावा वो सिंध की गर्वनर भी रही। 1990 में उनकी मृत्यु तक वो महिलाओं के लिए काम करती रही। उन्हें पाकिस्तान ने मादर—ए—वतन का खिताब दिया है।

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