Viral News

कर्मचारियों का उत्पीड़न कर देश की हवा बदलने चली हैवल्स कंपनी

ब्यूरो। हवा बदलेगी…टीवी पर सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हैवल्स इंडिया लिमिटेड के पंखों का ये विज्ञापन तो आपको याद ही होगा। देश की हवा बदलने चली ये कंपनी उत्तराखण्ड के हरिद्वार स्थित अपने प्लांट में कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रही है। यही नहीं श्रम विभाग की मिलीभगत से धांधली कर आवाज बुलंद करने वाले कर्मचारियों को बिना वजह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। पीड़ित कर्मचारी पिछले काफी समय से सिडकुल में ही धरना दे रहे हैं। लेकिन कपंनी प्रबंधन लगातार इनकी अनदेखी कर रहा है। कर्मचारियों की मांग है कि कंपनी के सिडकुल स्थित कारखाने की जांच की जाए और कुशल कारीगरों की पहचान कर उन्हें न्याय दिलाया जाए। लेकिन श्रम विभाग आज तक जांच नहीं कर पाया है। इतना ही नहीं कंपनी में जिन ठेकेदारों को संविदा पर श्रमिक रखने का लाइसेंस दिया गया है। उनकी भी आज तक जांच नही हुई। ठेकेदार तय सीमा से कहीं ज्यादा संविदा श्रमिकों को कंपनी में काम दिला रहे हैं। श्रम विभाग ये जांचने के लिए तैयार नहीं है कि ठेकेदारों के जरिए कुशल श्रमिकों को रखा जा रहा है या फिर अकुशल श्रमिकों को। जन बकि, उत्तराखण्ड सरकार की सीधी गाइडलाइन ये है कि ठेकेदारी प्रथा यानी कांट्रेक्ट लेबर से सिर्फ अकुशल श्रेणी के कर्मचारी ही कंपनी प्रबंधन रख सकती है। लड़ाई इसी बात की है, कंपनी ने अपने अधिकतर कर्मचारी ठेकेदारी प्रथा से लिए हैं और इनसे कुशल श्रमिकों वाला काम लिया जा रहा है। आवाज उठाने पर कर्मचारियों को मारा—पीटा गया और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। अब कर्मचारी भूखों मरने के कगार पर हैं और हैवल्स कंपनी टीवी पर हवा बदलकर देश बदलने की बात कर रही है।
क्या है पूरा मामला 
विवाद मई 2016 में तब शुरू हुआ जब कंपनी प्रबंधन अपने कर्मचारियों से खाली कागजों पर साइन कराकर अंगूठा लगवाने लगी। कई दूसरे दस्तावेजों पर भी कंपनी इसी तरह के साइन चाहती थी। जिसका प्रयोग अपनी मनमर्जी से किया जा सके। इसका कर्मचारियों ने विरोध किया तो कंपनी प्रबंधन ने विरोध कर रहे कर्मचारियों को निकाल दिया। तब से ये सैकड़ों कर्मचारी अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
लाइसेंस से ज्यादा कर्मचारी हैं कंपनी में 
किसी भी कंपनी को अपना प्लांट लगाने से पहले कारखाने में रखे जा सकने वाले कर्मचारियों की क्षमता का लाइसेंस कारखाना अधिनियम के तहत लेना होता है। कर्मचारियों की लड़ाई लड़ने वाले सीआईटीयू के जिला महामंत्री एमपी जखमोला ने आरटीआई से जानकारी जुटाई। जिस के अनुसार कंपनी के दोनों प्लांटों में पांच—पांच सौ श्रमिकों का लाइसेंस लिया गया है। यानी कुल एक हजार कर्मचारियों की क्षमता का लाइसेंस कंपनी के पास है। वहीं एमपी जखमोला बताते हैं कि कंपनी के कर्मचारियों की संख्या एक हजार के पार हैं। करीब सतरह सौ कर्मचारी कंपनी में काम कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर संविदा पर रखे गए हैं। जबकि हैवल्स कंपनी इंजीनियरिंग उद्योग में आती है।
क्या है मांग 
श्रमिकों की मांग है कि कंपनी के दोनों कारखानों की जांच होनी चाहिए। साथ ही वहां काम की प्रकृति के आधार पर काम कर रहे श्रमिकों का चिन्हीकरण होना चाहिए। चूंकि कंपनी में कुशल श्रमिक का चिन्हीकरण हो जाने के बाद नियमानुसार आंदोलन कर रहे श्रमिक कंपनी के नौकर मान लिए जाएंगे। ऐसे में वो संविदा ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त हो जाएंगे और कंपनी प्रबंधन सीधे उनके अधिकारों के लिए जिम्मेदार होगी। इसी के साथ उनकी मांग कंपनी में श्र​म कानूनों का पालन कराने की है और एक तरफा कार्रवाई कर बाहर निकाले गए श्रमिकों को वापस लेने की है। इसको लेकर श्रमिक काफी समय से धरना दे रहे हैं। मांगों को लेकर श्रम विभाग से लेकर जिलाधिकारी और सीएम तक श्रमिकों ने अपनी बात रखी। लेकिन सरकार का संवेदनहीन रवैये के कारण श्रम विभाग भी श्रमिकों की आवाज नहीं सुन रहा है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.