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उत्तराखण्ड: कांग्रेस मजबूत नहीं मजबूर विपक्ष बनकर रह गई, ये नेता बस अपनी दुकान चमकाने में व्यस्त

चंद्रशेखर जोशी।
सियासत में शह मात का खेल तो हमेशा से होता आया है। चुनावो में हार जीत लगी रहती है। चुनाव में विजय प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल पर जनमानस की उम्मीदों पर खरा उतरने की जिम्मेदारी होती है तो वही जनता द्वारा नकारे जाने वाले विपक्ष की जिम्मेदारी ओर भी बढ़ जाती है। उसे एक ओर जनहित मुद्दों की आवाज को सरकार की चौखट तक ले जाना होता है तो वही दूसरी ओर हार के कारणों को खोजकर संगठन को दुरुस्त भी करना होता है। लेकिन 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा से मुहँ की खाने के बाद भी कांग्रेस ने सियासत के इन पहलुओं पर कतई ध्यान नही दिया। न तो कांग्रेस ने हार के कारणों की विधानसभा या जिला स्तर पर कोई समीक्षा की और न ही संगठन को दुरुस्त करने की कोई ठोस पहल की। हाँ प्रदेश स्तर पर जरूर एक समीक्षा बैठक की खानापूर्ति की गई। जिसके परिणाम ढाक के तीन पात ही रहा। लेकिन फिर भी 2022 के चुनाव में सत्ता पाने की छटपटाहट कांग्रेस के नेताओ और कार्यकर्ताओं में बहुत देखी जा सकती है। प्रदेश से लेकर जिला व ब्लॉक से लेकर पंचायत तक धड़ो में बंटी कांग्रेस किसके सहारे 2022 की नैया पार करने का सपना देख रही है यह समझ से परे की बात है।

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प्रदेश स्तर पर अपनी ढपली अपना राग
उत्तराखण्ड प्रदेश में कांग्रेस के कितने धड़े है यह स्वयं कांग्रेसियों को भी नही पता होगा। यूं तो सोनिया गांधी ने प्रीतम सिंह को सूबे की कमान दी हुई है अर्थात उन्हें कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर सुशोभित किया हुआ है। वैसे तो प्रीतम सिंह की स्वीकार्यता कांग्रेस के हर गुट में है लेकिन फिर भी संगठन को धार देने में वह नाकामयाब ही साबित हुए है। वह बहुत लंबे अरसे बाद अपनी कार्यकारिणी बनाने के बावजूद एक मजबूत विपक्ष का अहसास अभी तक नही करा पाए। बावजूद इसके कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत सोशल मीडिया ले लेकर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में कुछ न कुछ शिगूफा छोड़ते ही रहते है जिससे उनकी पार्टी सहित सत्ता के गलियारों में चर्चा तो जरूर होती है लेकिन इससे भी बहुत ज्यादा फायदा कांग्रेस को मिलता नही दिख रहा। बल्कि उलट गुटबाज़ी को हवा मिलती दिखाई देती है। दोनों के समर्थक एक दूसरे को 2022 का मुख्यमन्त्री प्रोजेक्ट करते रहते है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय कांग्रेस से ज्यादा वन अधिकार आंदोलन में व्यस्त है। तो नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश अपने विधानसभा क्षेत्र हल्द्वानी से बाहर यदा कदा ही दिखाई पड़ती है और इसी कारण राजनीतिक हलकों में मित्र विपक्ष की भूमिका की चर्चा आम रहती है। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी भी पिछले कुछ समय से प्रदेश में अधिकतर समय दे रहे है उन्होंने कई स्थानीय मुद्दों को हवा दी जिसमे उन्होंने युवा कांग्रेस व एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं को लामबंद करने की कोशिश की। उनके उठाये मुद्दों की काफी चर्चा भी हुई। अभी कांग्रेस के पास 11 विधायक है वह भी धड़ो में बंटे रहते है। इससे कांग्रेस का 2022 का मिशन फतेह इतना आसान दिखाई नही पड़ता।

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हरिद्वार में संगठन है बेहद कमजोर
हरिद्वार जनपद को कांग्रेस ने चार जिलों में बांटा हुआ है। जिसमे हरिद्वार महानगर, हरिद्वार ग्रामीण, रुड़की महानगर व रुड़की ग्रामीण शामिल है। संगठन की हालत यह है कि रुड़की ग्रामीण के पूर्व जिलाध्यक्ष मास्टर सतपाल लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हो गए थे। तब से आज तक कांग्रेस वहां जिलाध्यक्ष नही बना पाई। कार्यकारिणी या बूथ की बात तो बहुत दूर है। रुड़की महानगर में कलीम खान को दूसरी बार अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली हुई है लेकिन सांगठनिक स्तर पर रुड़की में यह आलम है कि निगम चुनाव में कई वार्ड में कांग्रेस को प्रत्यासी भी नही मिल पाए। हरिद्वार महानगर में संजय अग्रवाल अध्यक्ष की जिम्मेदारी का निर्वाहन कर रहे है। प्रदेश की ओर से मिले कार्यक्रम पर पुतला दहन इनकी उपलब्धि कही जा सकती है। हरिद्वार ग्रामीण जिलाध्यक्ष धर्मपाल तो अपनी उपस्थिति कभी कभी हरिद्वार महानगर के कार्यक्रम में लगाकर ही इतिश्री कर लेते है।

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कार्यकर्ताओ के सामने गुटबाज़ी है समस्या
कांग्रेस का कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में है। उसे 2022 में सरकार आने की उम्मीद तो दिखाई पड़ती है। लेकिन अपने आराम तलबी नेताओ को देखकर वह हताशा के अंधेरे में नींद लेने का प्रयास कर रहा है। उनके सामने समस्या यह भी है कि उसे पार्टी से ज्यादा तवज्जो नेता को देनी पड़ती है। या ऐसा कह लो उनके अपने अपने नेताओं के कार्यक्रमो में शामिल होने व दूसरे नेता के पास न जाने का हुक्म रहता है। जिससे पार्टी को ही नुकसान होता है।

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स्थानीय मुद्दे, सांगठनिक रणनीति का रहता है अभाव
कांग्रेस में राज्य या केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर मील कार्यक्रमो या विरोध प्रदर्शनों को ही महत्त्व दिया जाता है। जबकि स्थानीय मुद्दों का जनता पर अधिक प्रभाव होता है लेकिन सांगठनिक रणनीति के अभाव में स्थानीय मुद्दों को तरजीह नही मिल पाती। इसी कारण जनता का जुड़ाव भी कांग्रेस से नही बन पा रहा है। कार्यकर्ताओ से संवाद व रणिनीति बैठकों का दौर कांग्रेस में लगभग समाप्त से ही हो गया है।

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2022 नजदीक, लेकिन कांग्रेस से सत्ता अभी दूर
आगामी विधानसभा चुनाव 2022 में होने है। जिसका समय अब नजदीक आ रहा है। लेकिन कांग्रेस की सत्ता पाने की हसरते अभी बहुत दूर दिखाई पड़ती है। अगर प्रदेश में आक्रामक विपक्ष, मजबूत संगठन, ठोस रणनीति व कार्यकर्ताओ से संवाद का यही आलम रहा तो देहरादून का कुर्सी परिवर्तन इतना आसान नही है। हालांकि भाजपा सरकार से भी प्रदेश का आम जनमानस बहुत संतुष्ट दिखाई नही पड़ता। लेकिन कांग्रेस को सत्ता में आने लिए अपने गिरेबान में जरूर झांकना चाहिए।

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क्या कहते है नेता
युवा कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव राम विशाल देव का कहना है कि कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा रही है और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठा रही है। कांग्रेस में कोई गुटबाज़ी नही है। सभी नेता एकजुट होकर कार्य कर रहे है। जनता त्रिवेन्द्र सरकार से परेशान है और कांग्रेस से जनता को बहुत उम्मीद है। प्रीतम सिंह व हरीश रावत के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन होना तय है।

कांग्रेस नेता व जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष राव आफाक अली का कहना है कि संगठन को मजबूत करना बहुत जरूरी है। जनता को हरीश रावत सरकार की याद आ रही है। उनकी चलाई सभी योजनाओं को भाजपा सरकार ने बंद कर दिया है। इसलिए जनता में बहुत आक्रोश है। हरीश रावत जनता के दिलो में बसे है उनके संघर्ष से भाजपा सरकार का जाना तय है।

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