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मलाईदार मंडी का अध्यक्ष बनने के लिए कांग्रेसियों में हाय—तौबा

ब्यूरो। ज्वालापुर मंडी समिति का अध्यक्ष पद बनने के लिए इन दिनों कांग्रेस नेताओं में जूतम पैजार चल रही है। मलाई वाली इस पोस्ट को हथियाने के लिए नेताजी तमाम हथकंडे अपना रहे हैं। अब मंडी समिति का अध्यक्ष बनने के लिए एक युवा नेता के किसी बिचौलिए को उपहार दिए जाने की बात सामने आ रही है। सोशल मीडिया पर आने के बाद इस मामले ने तूल पकड लिया है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने व्हट्सएप ग्रुप पर लिखा है कि इस पद के लिए दस लाख रुपए दिए गए। हालांकि हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। ना ही इसका कोई सबूत दिया गया है। हो सकता है कि से इस युवा नेता का नाम आगे रहने के चलते विरोध कर रहे कांग्रेस नेताओं ने ही ये मुद्दो उछलवा दिया हो। या फिर इस नेता की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा हो। कारण कोई भी हो लेकिन अब ये पद विवादों के घेरे में आ गया है। हालांकि इस युवा नेता के करीबी लोगों को कहना है कि दस लाख रुपए तो क्या ये महाशय किसी को दस हजार रुपए भी नहीं दे सकते हैं। इस बात में कोई भी सच्चाई नहीं हो सकती है। क्योंकि ये युवा तुर्क पैसा दस बार सोच समझकर बीस लोगों से राय लेकर ही खर्च करते हैं।
बहरहाल मामला जो भी हो लेकिन, दस लाख रुपए में अध्यक्ष पद घाटे का सौदा कतई नहीं है। ज्वालापुर मंडी प्रदेश में सबसे ज्यादा कर देने वाली मंडी है। कर का एक हिस्सा विकास कार्यों पर खर्च किया जाता हैं जो लाखों में होता है। इतना ही नहीं मंडी शुल्क में होने वाली गडबडी और अन्य मामले भी हमेशा चर्चा का विषय बनते रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश और केंद्र सरकार से किसानों और मंडी विकास के के लिए दर्जनों योजनाओं में धन मिलता है।

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मंडी समिति के पुराने अध्यक्षों का इतिहास देखकर भी कांग्रेस के नेताओं का जी ललचा रहा है। भावनाएं हिलोरें मार रही हैं जो सीधे देहरादून की दौड धूप करा रही हैं। ये मंडी समीति से होने वाले लाभ का ही जलवा था कि पूर्व मंडी अध्यक्ष संजय चोपडा और उपाध्यक्ष अरशद ख्वाजा के बीच गाली गलौच, मार—पिटाई तक हो गई। दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ केस दर्ज कराया और बाद में समझौता भी हो गया। हालांकि, संजय चोपड़ा के अध्यक्ष बनने के बाद मंडी अध्यक्ष का पद ज्यादा चर्चा में आ गया। क्योंकि उनकी चर्चा में रहने की सोच के कारण ज्वालापुर मंडी रोजाना अखबारों में छाई रहती थी। हरक सिंह रावत के भाजपा में जाने के बाद संजय चोपडा ने इस्तीफा दे दिया और तभी से कांग्रेसियों में इस पद को लेकर हाय—तौबा मची है। वहीं वर्तमान पदाधिकारी भी अपने पदों को बनाए रखने की जोड़ तोड में लगे हुए हैंं।

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