Jyotish

मानवता में मौजूद है मानव जीवन की सफलता

4b34f7d1-ca44-4cd2-861e-e06738db6f91मानवता में मौजूद है मानव जीवन की सफलता
देहरादून। मानव जीवन की सफलता केवल मानव शरीर धारण कर लेने में नहीं है, बल्कि मानवता धारण करने में है। जिस शरीर पर मानव अभिमान करता है, उस शरीर की वास्तविकता क्या है? इसकी जानकारी करना पहले आवश्यक है। सन्त निरंकारी भवन रेस्ट कैम्प में रविवारीय सत्संग कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए स्थानीय ज्ञान प्रचारक पूज्य बहन सुशीला रावत जी ने व्यक्त किये।
इस अवसर पर उन्होंने कहा कि इस बात पर विचार किया जाना जरूरी है कि इस मानव शरीर का मूल्य मानवता के बिना क्या है? क्योकि मानवता के बिना इस नाशवान शरीर का कोई मूल्य ही नही है। वेदों-शास्त्रों में इस मानव शरीर को अमोलक कहा गया है और इसे माटी का पुतला भी कहा है। जिसने इस शरीर में सत्य को जान लिया उसके लिए ये शरीर अमोलक है तथा जो इस सत्य से अनभिज्ञ है उसके लिए यह माटी का पुतला है। सत्य मात्र परमपिता परमेश्वर निराकार ब्रहम है, जो सभी मानवमात्र एवं समस्त चर-अचर में व्याप्त है। जो मानव सब में उस निराकार को देखता है, उसके हृदय में ही मानवता वास करती है। ऐसी मनोदशा होने पर मन से अपने-पराये का भेद मिट जाता है। ऊॅच-नीच के भेद समाप्त हो जाते है तथा समद दृष्टि वाला भाव मन में आ जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि यदि मानव होने की पहचान बनानी है और धर्म को जिन्दा रखना है, तो मानवता की डगर को अपनाना ही होगा। आजकल धर्म को जो स्वरूप बन रहा है, उसमें दया, क्षमा, सहनशीलता, विशालता, प्रेम का स्थान खोता जा रहा है। धर्म के नाम पर नफरतों की दीवारें खड़ी की जा
रही है। ऐसे में मानवता के द्वारा ही इन दीवारों को खत्म किया जा सकता है। तभी हम सच्चे रूप में परमात्मा को प्राप्त कर सकते है और सबको एक परमपिता परमात्मा की सन्तान समझकर दया, करूणा, परोपकार की भावना से मानवमात्र की सेवा भी करते है, जिससे मन में शान्ति और लोक-परलोक सुहेला
हो सकता है। सत्संग समापन से पूर्व अनेकों सन्त महात्माओं ने गीत, भजन, विचार एवं कविता के माध्यम से अपने-अपने विचार व्यक्त करके हरीश सकलानी, एस0एस0 तडियाल, रवि आहुजा, सुरेन्द्र सिंह रावत,रविन्द्र बडोनी, बहन सर्वेश तथा बहन पिंकी जी सतगुरू के आर्शीवादों के पात्र बने। मंच संचालन बहन सुमित्रा रमोला जी ने किया गया।

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