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परमार्थ निकेतन में बौद्ध धर्मगुरूओं ने वैश्विक समस्याओं के लिये मिलकर कार्य करने का लिया संकल्प

ब्यूरो।
ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन गंगा तट आज राष्ट्र, पर्यावरण एवं जल संरक्षण, माँ गंगा सहित देश की सभी नदियांे को समर्पित मानस कथा में परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सहभाग किया। उन्होने विश्व महासागर दिवस पर जलीय जीवन का संरक्षण करने का संकल्प कराया। इस वर्ष इसकी थीम भी ’एक साथ मिलकर हम अपने समुद्रों को बचा सकते ह’ै रखी गयी है।

पृथ्वी एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर अत्यधिक मात्रा में जल है इसलिये इसे ’’जलीय ग्रह’’ भी कहा गया है और इसका सबसे अच्छा स्रोत महासागर है। पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल से घिरा है। आज बढ़ते प्रदूषण के कारण जलीय ग्रह भी बिना जल के होने की कगार पर खड़ा है। प्रदूषण के कारण एक ओर तो जल संकट बढ़ रहा है वही दूसरी ओर जलीय जीवन नष्ट हो रहा है। ’ईको वाच’ पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य करने वाली वेबसाइट के अनुसार समुद्र में बढते प्लास्टिक के कारण प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख से अधिक जलीय जीवों की मौत हो जाती है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वर्ष 2030 तक पृथ्वी पर प्लास्टिक की मात्रा आज की तुलना में दोगुनी हो जायेगी। आज जिस गति से प्लास्टिक का निर्माण हो रहा है उसकी तुलना में आधा भी रिसाइकिल नहीं किया जाता जिसके कारण सब प्लास्टिक समुद्र में एकत्र हो रहा है जिससे समुद्री जीवों का दम घुटने लगा है। कहा जा रहा है कि प्रशांत महासागर में 80 हजार टन से अधिक प्लास्टिक एकत्र हो गया है, जो जलीय जीवन के लिये सबसे बड़ा संकट है। हमें समुद्री वनस्पति से आॅक्सीजन प्राप्त होती है परन्तु अब समुद्री सतह पर प्लास्टिक इस प्रकार एकत्र हो गया है कि जलीय वनस्पतियां नष्ट हो रही है जिससे धरती परऑक्सीजन, खाद्य सामग्री और अन्य कई संसाधनों की मात्रा भी कम हो रही है। हम मुम्बई समुद्र की बात करें तो जब उसमें ज्वार आता है तो कुछ कचरा-कूडा किनारों पर आ जाता है उससे कई प्रकार की बीमारियां फैलती हैं जिसका सामना वहां रहने वाले लोगों को करना पड़ता है इसलिये हमें एकल उपयोग वाले प्लास्टिक के उपयोग पर रोक लगानी होगी।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कथा के मंच से कहा कि ’’उसी मनुष्य का जीवन शांत और सुखद रह सकता है जो कामनाओं को छोड़कर जीता है। समुद्र हमें यही शिक्षा देता है कि उसमें कितनी भी नदियां आकर मिले फिर भी वह शांत रहता है। उसी प्रकार भक्त और ज्ञानी व्यक्ति हर परिस्थिति में शांत बना रहता है। भगवत गीता में भी समुद्र की महिमा गायी गयी है। समुद्र इतना विशाल है, पूर्ण है, अचल प्रतिष्ठा वाला है लेकिन जब उसमें अनेक नदियों का जल आता है तब बिना चलायमान हुये सब कुछ उसमें समा जाता है। उसी प्रकार जब व्यक्ति की बुद्धि स्थिर हो जाती है उसके लिये समस्त भोग, कामनायें उसे चलायमान नहीं कर पाती बल्कि सब उसमें समा जाते है। व्यक्ति सब के बीच में रहते हुये भी चलायमान नहीं होता और शान्ति को प्राप्त कर लेता है। भोगों को प्राप्त करने वाले व्यक्ति कभी शान्ति नहीं प्राप्त कर सकता। स्वामी जी ने कहा कि कठोपनिषद् में कहा गया है कि ’’उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्न्ािबोधत’’ उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरूषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो तो धीरे-धीरे जीवन शांत हो जायेगा। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य के पास जितनी इच्छायें होगी उतना तनाव बढ़ता जायेगा और जितनी इच्छाओं शांत होते जायेगी उतना ही तनाव कम होते जायेगा।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि जल का प्रदूषण जल का संकट न केवल स्वयं में भयावह है, बल्कि यह साथ में रोजगार की कमी, खाद्य सुरक्षा, ऑक्सीजन की कमी जैसी अनेक समस्याओं को लेकर आयेगा। आज भारत में 1 अरब से अधिक लोग जल की समस्या झेल रहे है और पूरे विश्व में यह संख्या 4 अरब से अधिक है। उन्होनेे कहा कि अब हमें जल संरक्षण के लिये जल का उचित और प्रभावी उपयोग किया जाये।
आज की मानस कथा में संत श्री मुरलीधर जी ने भगवान श्री राम और शबरी के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुये भक्त का भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और श्रद्धा के विषय में भावपूर्ण प्रकाश डाला। अनेक दिव्य प्रसंगों एवं अद्भुत भजनों के द्वारा सभी भक्तगणों को भक्ति गंगा में सराबोर हो उठे और गा उठे धन्य-धन्य हो शबरी, जय-जय श्री राम।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने बौद्ध धर्मगुरूओं के साथ आज विश्व महासागर दिवस के अवसर पर सभी को जल संरक्षण का संकल्प कराया तथा विश्वाभिषेक कर विश्व महासागर दिवस मनाया।

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