शायरी

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कभी थकन के असर का पता नहीं चलता, वो साथ हो तो सफ़र का पता नहीं चलता

कभी थकन के असर का पता नहीं चलता वो साथ हो तो सफ़र का पता नहीं चलता वही हुआ कि मैं आँखों में उसकी डूब गया वो कह रहा था भँवर का पता नहीं चलता उलझ के रह गया सैलाब कुर्रए-दिल से नहीं तो दीदा-ए-तर का पता नहीं चलता उसे भी खिड़कियाँ खोले ज़माना बीत […]

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मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ, माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊँ कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ सोचता हूँ तो छलक उठती हैं मेरी आँखें तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊँ चारागर […]

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हर एक चेहरा यहाँ पर गुलाल होता है हमारे शहर मैं पत्थर भी लाल होता है मैं शोहरतों की बुलंदी पर जा नहीं सकता जहाँ उरूज[1] पर पहुँचो ज़वाल[2] होता है मैं अपने बच्चों को कुछ भी तो दे नहीं पाया कभी-कभी मुझे ख़ुद भी मलाल होता है यहीं से अमन की तबलीग[3] रोज़ होती […]

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आदतन तुम ने कर दिये वादे, आदतन हम ने ऐतबार किया

आदतन तुम ने कर दिये वादे आदतन हम ने ऐतबार किया तेरी राहों में हर बार रुक कर हम ने अपना ही इन्तज़ार किया अब ना माँगेंगे जिन्दगी या रब ये गुनाह हम ने एक बार किया